दिन 118
यह नई वस्तु
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तुझ में बढ़ता हुआ,
तू, मुझ में बढ़ता हुआ,
एक आत्मा उठती हुई,
उजियाला अन्धकार को बाहर धकेलता हुआ,
तेरे भीतर।
रसायन बदलते हैं,
विचार-प्रक्रियाएँ बदलती हैं,
मानसिकताएँ चूर-चूर होती हैं।
प्रचण्ड, फिर भी संयमित…?
प्रचण्ड, फिर भी संयमित? यह अब भी बनी रहने वाली वस्तु क्या है, यह संयम? यही मूल समस्या है, है ना? क्या यह वह शारीरिक टुकड़ा है जिसे तूने पिता, मुझ में छोड़ दिया? क्या इसे रहना ही होगा? क्या यह सदा रहेगा?
मेरा हृदय (मन) एक ऐसी विजय में आनन्दित होने की लालसा से फटा जा रहा है जो अब तक पूरी तरह प्राप्त नहीं हुई। क्या मुझे ऐसा करना चाहिए? क्या मुझे पूरी तरह आनन्दित होना चाहिए जब अभी भी काम करना बाकी है? क्या यह संयम बुद्धिमान, समझदार, और आत्मा से अगुवाई पाया हुआ है? एक वाणी कह रही है, "क्या यह सच है; क्या यह सचमुच तू है, पिता?" क्या यह संयम संदेह है? क्या यह बुद्धि है? यह सुरक्षित लगता है, फिर भी यह संदेहास्पद लगता है। इसे जड़ से उखाड़ दे, पिता।
मैं सच्ची स्वतंत्रता चाहता हूँ, एक गहरी स्वतंत्रता। मैं उस असंयमित स्वतंत्रता को चाहता हूँ जो एक योद्धा को तेरे सामने घुटने टेककर अपनी तलवार सौंपते समय होती है, या उस कुँवारी की जो यह समझ लेती है कि तू ही एकमात्र सच्चा पति है। मैं हर बात में तेरे अधीन होना चाहता हूँ, साथ ही यह बुद्धि भी कि मैं अपने ही प्रयत्नों पर घमण्ड न करूँ। मुझे ऐसे हृदय से भर दे जो केवल तेरे मुझ में किए गए काम पर घमण्ड करना चाहे। "उसने यह किया। देखो। मेरे पापा को देखो। वह तुझे कभी मुझे चोट पहुँचाने नहीं देगा।"
यह लिखते समय आँसू बह रहे हैं। जैसे ही मेरी कलम काग़ज़ को छूती है, मुझ में का बालक समझ जाता है कि मैं अपने सांसारिक पिता के विषय में कभी ऐसे शब्द नहीं कह सकता था। मैं ऐसे शब्द उस व्यक्ति के बारे में कैसे कह सकता था जिसने मेरे छोटे हृदय को चोट पहुँचाई, न कि उसकी रक्षा की? मैं उसे क्षमा करता हूँ, और मुझे उससे क्षमा चाहिए। आज एक बड़ा प्रेम है, फिर भी मैं सोचता हूँ कि क्या संयम की जड़ें अब भी बची हैं।
नहीं पिता, ये संयम बुद्धिमान, समझदार, या आत्मा से अगुवाई पाए हुए नहीं हैं। यह समय है एक नए स्थान में क़दम रखने का; एक नई वस्तु में, जहाँ, मेरे जीवन में पहली बार, मुझे यह व्यक्तिगत प्रमाण मिलता है कि मेरा एक पिता है जो रक्षा करता है और चोट नहीं पहुँचाता। मेरे पास एक पापा है जो मुझे नहीं छोड़ेगा, तब भी जब मैं प्रेम के योग्य नहीं हूँ। मैं अब बिना किसी अस्वीकृति के, केवल प्रेम के पिता से शुद्ध प्रेम के साथ, सदा के लिये एक नया जीवन जी सकता हूँ।
मुझ में यह संयम क्या है? आ पापा। आ।
क्योंकि वह लालसा से भरे प्राण को तृप्त करता है, और भूखे प्राण को भलाई से भर देता है। (भजन संहिता 107:9)
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